rashtrya ujala

Wednesday, March 10, 2010

बदन से सरकते कपड़े---

बदन से सरकते कपड़े , जी हाँ आजके वर्तमान परिवेश में आपको आसानी से दिख जायेगा । अब ये आपको हर गली नुक्कड़ , बाजार हो या शोपिग माल छोटे कपड़ो मे लड़कियां आपको आसानी से दिख जायेंगी । कल तक छोटे कपड़े रैंप पर कैटवाक करती मॉडल्स अपने डिजाइनर्स के कलेक्शन को पेश करने के लिए पहनती थीं, लेकिन आजकल ऐसे कपड़े आम शहरी लड़कियाँ भी पहन रही हैं। जो दिखता है, वही बिकता है' की तर्ज पर अब लड़कियाँ भी 'बिंदास बाला' की छवि में खुद को ढालती जा रही हैं और बेझिझक अपने मांसल सौंदर्य का प्रदर्शन कर लोगों की वाहवाही बटोर रही हैं। और हर जगह कहती फिरती है कि ये हमारा हक है । ठिक है हक और भी तो है , तो क्या इस हक की जरुरत ज्यादा है इनकों । ऐसे कपड़ो में घुमती फिरती है और कहती है कि "Am I Looking hot and sexy ?" और अगर आप ने हाँ कह दिया तो क्या हौसले और भी बुलंद ।
अभी कुछ दिनों पहले की बात है मै टी वी देख रहा था , की अचानक मेरी नजर इड़िया टीवी पर पड़ी और देखा किसी अदालत नामक सीरियल पर पड़ी , जहाँ एक एपिसोड में एक कटघरे में स्वामी बाबा रामदेव थे औत दूसरे कटघरे में बोलीवुड की आइटम गर्ल समंभावना सेठ और कश्मिरा शाह थी । मुद्दा चल रहा था भारतीय संस्कृति को लेकर , तो बाबा जी कह रहे थे कि ये जो आप कम कपड़ो मर डांस करती है ये अच्छा नहीं होता । इसपर समंभावना सेठ ने कहा कि बाबा अभी शर्त लगाईये , यही नाचूँ और हर मर्द खड़े होकर ताली बजाने पर मजबूर ना हो जायें तो कहिएगा । इस पर बाबा जी चुप हो गये । अब आप ही बताईये अगर वहाँ मर्द होंगे तो ऐसे नित्य पर तालियाँ तो बजेंगी ही । छोटे कपड़े पहनकर अपने बदन की सुंदरता का प्रदर्शन करना युवा लड़कियों के लिए अब एक फैशन बन गया है। जिसका बदन जितना अधिक दिखेगा उसे लोग उतना ही सुंदर व सेक्सी कहेंगे। अब लड़कियों के लिए 'सेक्सी' संबोधन एक अपशब्द नहीं बल्कि सुंदरता का पैमाना बन गया है। एक समय था जब हम और आप या कोई भी सेक्सी शब्द कहने में शर्म महशुस करता था , परन्तु एक समय आज है कि ऐसे शब्दो का प्रयोग करना मतलब इज्जत देना । फैशन शो, फिल्मी अभिनेत्रियों के कपड़े आदि सभी युवा लड़कियों को ग्लैमर के रंग में ढाल रहे हैं। कल तकमल्लिका शेरावत व राखी सावंत के छोटे कपड़े दर्शकों को आँखे मूँदने पर मजबूर करते थे परंतु आज सबसे ज्यादा माँग इन्हीं बिंदास अदाकाराओं की है। शर्म की बात है ना , जो हमारे संस्कृति को धूमिल करने मे लगा है उसकी माँग मार्केट मे सबसे ज्यादा है । कल तक हम बस फिल्मो में इन्हे देख पाते थे परन्तु अब इनकी परछाई हर जगह आसानी से दिख जाती है ।
ऐसे छोटे कपड़ो की माँग भी नित्य ही बढ़ती जा रही है , । अब आप बाजार या कपड़े की दूकानं पर जायेगे तो सबसे पहले स्कर्ट या इस प्रकार के ही छोटे कपड़े दिखेंगे । मुंबई की मायानगरी से निकलकर ग्लैमरस कपड़ों का फैशन बड़े-बड़े महानगरों तक पहुँचता जा रहा है, जहाँ शोरूम में सजने के बाद सर्वाधिक बिक्री उन्हीं कपड़ों की होती है जिनकी लंबाई कम व लुक ट्रेंडी होता है। यही नहीं महानगरों के नामी स्कूलों, कॉलेजों, एयर होस्टेस एकेडमी आदि का ड्रेस कोड ही मिनी स्कर्ट-टॉप व फ्रॉक बन गए हैं। कल तक घर-गृहस्थी संभालने वाली लड़कियाँ भी अब फैशन शो व सौंदर्य प्रतियोगिताओं में बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं और नए फैशनेबल वस्त्रों के अनुरूप अपने बदन को ढाल रही हैं। अब जब माँ अपनी बेटी को सलवार-कमीज पहनने को कहती है तो बेटी शान से कहती है कि 'माँ, अब तुम भी बदल जाओ। आज तो स्कर्ट व कैप्री का दौर है। सलवार-कमीज तो गाँव की लड़कियाँ पहनती हैं।' बुद्धि से बच्चे भले ही बड़े न हों, पर पहनावे से आजकल की किशोरियाँ अपनी उम्र से बहुत अधिक बड़ी हो गई हैं। यह सब बदलते दौर की 'फैशन' का प्रभाव है जिसने भारतीय संस्कृति की छाप को मिटाकर सिर से आँचल व पैरों से पायल को लुप्त कर दिया है ,आजकल का फैशन ही शार्ट स्कर्ट, शार्ट फ्रॉक्स आदि हैं।
जो फैशन बाजार में दिखता है, वही बिकता है। इसी तर्ज पर आज छोटे कपड़े युवतियों की पहली पसंद बन गए हैं। । भला जिस भावी पीढ़ी का नेतृत्व रिया सेन, किम शर्मा व राखी सावंत जैसी अभिनेत्रियाँ करें उस पीढ़ी की युवतियाँ पूरे शरीर को ढँकने वाले लंबे कपड़े कैसे पहन सकती हैं?

Monday, March 8, 2010

अजब का आरक्षण

13 साल से एक जंग लड़ी जा रही है आबादी के आधे हिस्से द्वारा। महिला आरक्षण विधेयक के साथ ही एक किरण जन्म ले रही हैं कि आधी आबादी अपना हक पाने में सफल रहेगी। लेकिन एक बात जो अब तक समझ में नहीं आई कि इसका 13 सालों तक विरोध क्यों होता रहा? क्यों नहीं लागू हो सका ये अब तक? क्या महिला आरक्षण इतना भयावह है कि देश के कई नेता इसके लागू होने पर असुरक्षित हो जाएँगे? क्या महिलाएँ फिर इनके बस में नहीं रहेंगी?
या फिर हम इस तरह सोचें कि क्या इसके लागू होने भर से महिलाओं को सारी समस्याओं से मुक्ति मिल जाएगी? क्या सचमुच महिला आरक्षण बिल उन्हें इतना सशक्त कर देगा कि फिर कोई प्रतिभा दमन और हक मारने की गलत इबारत नहीं लिख सकेगा। सच थोड़ा सा अलग है। असल में इस बिल के बाद एक दूसरी जंग शुरू होगी।
कब हो सकेगा लागू? ;यह बिल संविधान संशोधन विधेयक होने के कारण राज्यसभा और लोकसभा में दो-तिहाई बहुमत से पारित होना जरूरी है। इसके बाद, आधी विधानसभाओं (15) से दो-तिहाई बहुमत से पास होने के बाद यह कानून का रूप धारण कर सकेगा।
अगर हो गया लागू ;इस विधेयक के बाद हर 10 साल में चुनावी सीटों पर रोटेशन होगा।। इस पक्ष पर अभी पूरी तरह से ध्यान नहीं दिया गया है। इसका एक पक्ष यह है कि कोई भी सदस्य अब अपने निर्वाचन क्षेत्र को अपनी प्रॉपर्टी नहीं समझ सकता। क्योंकि नियमानुसार यह अब बदलता रहेगा। ऐसे में बरसों से एक ही सुरक्षित सीट पर चुनाव लड़ने का और कम मेहनत में जमी जमाई मलाई खाने का नेताओं का मजा किरकिरा हो जाएगा।
किन्तु जो नेता अपने निर्वाचन क्षेत्र को लेकर सचमुच गंभीर होते हैं उनकी दिलचस्पी अब अपने क्षेत्र से घटेगी। क्योंकि निर्वाचन क्षेत्र स्थायी न रहने से उन्हें बस तात्कालिक फायदे वाले मुद्दे ही नजर आएँगे। लंबे समय से अटके विकास कार्य या लंबे समय के लिए आरंभ होने वाली योजनाएँ हाथ में लेने से वे कतराएँगे।
किसके लिए है और कौन लाभान्वित ;यहाँ थोड़ा सा संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वंचितों के लिए लागू यह विधेयक स्थापित नेताओं के घरों की महिलाओं को ही कृतार्थ करें? या फिर आरक्षण के नाम पर टिकट वितरण हो और ताबड़तोड़ पाने की लालसा में महिला शोषण का नया रास्ता खुल जाए? ऐसा नहीं है कि हम महिला आरक्षण बिल के विरुद्ध हैं लेकिन उसके हर पहलू को समझना भी जरूरी है। इसका लाभ हर उस महिला तक पहुँचे जो सदियों से इसकी अधिकारिणी है, यह जिम्मेदारी कौन लेगा?
विरोध के लिए विरोध :राजनीति की बिसात पर जिन्हें बस विरोध ही करना है, वे अपनी समझ के दरवाजे कभी नहीं खोलेंगे। आखिर क्यों महिला दिवस के शताब्दी वर्ष में भी महिलाओं को अपने लिए इस तरह के संघर्षों का सामना करना पड़ रहा है? इस बिल से नेता इतने अधिक आतंकित है कि उपराष्ट्रपति के हाथों से बिल की प्रतियाँ फाड़ देने पर मजबूर हो गए? शर्म आती है इन्हें अपना प्रतिनिधि कहते हुए। एक स्वस्थ और अनिवार्य बहस के लिए आज भी महिलाएँ इन्हीं की मुखापेक्षी हैं। ये कैसे नेता हैं, महिलाओं की प्रतिभा से डरते हैं या अपनी ही असलियत के सामने आ जाने से?
आरक्षण के साथ संरक्षण भी :ये बात विरोध कर रहे नेता भी भली भाँति जानते हैं कि महिलाओं को अगर एक स्वस्थ, सुरक्षित और सहज वातावरण भर मिल जाए तो वे कभी इन पर निर्भर नहीं है। लेकिन चुँकि खुला संतुलित और संयमित माहौल देना उनके बस का नहीं है इसलिए आरक्षण की जरूरत आन पड़ी। अगर पहले ही महिलाओं को उनके सहज नैसर्गिक अधिकार मिल गए होते तो जरूरत किसे थी आरक्षण की?
महिलाएँ सक्षम हैं स्वयं को साबित करने के लिए मगर बात सिर्फ मौके की है जो कुछ लोग देना नहीं चाहते। अगर आज भी पुरुष थोड़ा सा उदार हो जाए तो सदियों का अत्याचार भी भुला देने को तैयार है औरतें। मगर असल मुश्किल तो यही है। पिछड़ने के डर से ये नेता बिल को पछाड़ने में लगे हैं।
आरक्षण से लगाम ;यह सच है कि महिलाएँ अब बदल रही है। इतनी तेजी से कि पुरुष चौंक सा गया है। आरक्षण की छड़ी मिलने से उसकी मुखरता और प्रखरता बढ़ेंगी इसमें कोई शक नहीं। उसके सपने भी बदलेंगे और सपनों को पूरा करने का तरीका भी। एक लगाम उन बेलगामों पर भी कसेंगी जिनके लिए आज भी महिला इस्तेमाल की 'चीज' है।
उम्मीदें जिन्दा हैं :यह सदियों का स्वीकारा हुआ सच है कि महिलाओं को जो कुछ भी मिला है वह सहजता से नहीं मिला है। संघर्ष की एक लंबी दास्ताँ उसे लिखनी ही पड़ी है। आरक्षण भला कैसे आसानी से मिल जाएगा? लेकिन यह सच भी उतना ही चमकदार है कि लड़ाई हमेशा उसने जीती है, क्योंकि हारना उसे नहीं आता। उम्मीद कीजिए कि सौ साल के सफर में हम अढ़ाई कोस से आगे निकल आए। उम्मीदें अभी जिन्दा हैं।

Wednesday, February 24, 2010

नंदगांव के मतवाले पर बरसाना में प्यार भरी लाठियां

बरसाना। वर्षों से चली आ रही रंगों में रंगी रंगीली और रंगीले अंदाज में नंदगांव के मतवाले हुरियारे। पहले खूब हंसी-ठिठोली फिर गा कर रिझाया-फाग खेलन बरसाने आएं हैं नटवर नंद किशोर..। इसके साथ ही फाग की मस्ती और अटूट पे्रम से भरीं लाठियां हाथ में लेकर रंगीली गली में हुरियारों को झूरने उतरीं बरसाने की हुरियारिनें।
सतरंगी रंगों में सराबोर रंगीली गली में सिर पर बरसतीं लाठियों की तडतड और राधे-राधे की गूंज के बीच आसमान से होली पर बरसते पुष्पों के नजारे ने जैसे द्वापर युग को सजीव कर दिया। इस अनोखे नजारे का दर्शन करने के लिए देश-विदेश से बडी तादाद में श्रद्धालुओं ने आकर अपने को धन्य किया।
बरसाना में मंगलवार शाम को खूब अबीर-गुलाल और रंग बरसा। परंपरा अनुसार नंदगांव के हुरियारे समूह के रूप में बरसाने की पीली पोखर पर पहुंचे। यहां उन्होंने अपने सिर पर ढाल और मजबूत साफा-पगडी बांध कर अपनी पूरी तैयारी कर ली और चल पडे लाडली जू मंदिर। मंदिर पर बरसाने के समाज की ओर से इनका स्वागत किया गया। मंदिर परिसर में बरसाने और नंदगांव के लोगों के बीच होली गीतों के साथ समाज गायन हुआ।
एक घंटे तक चले इस गायन के बाद नंदगांव के हुरियारे ढोल नगाडे बजाते नाचते-गाते दिखाई दिए। इसके बाद मंदिर में शुरू हुआ रंगों की होली का सिलसिला। रंगीली गली से चौक तक करीब एक से डेढ घंटे तक चले इस विश्वप्रसिद्ध लठामार होली के दौरान लाठियों की ताबडतोड वार के बावजूद हुरियारे भी कहां मैदान में डटे रहे। सिर पर ढाल रख प्रहारों के बीच खूब नाचते और ठिठोली कर रहे थे। इस अद्भुत नयनाभिराम दर्शन को लालायित श्रद्धालु श्री राधे-राधे के जयकारे लगाते उत्साह और जोश से होली की मस्ती में मदमस्त दिखाई दे रहे थे। सभी ने एक दूसरे पर खूब रंग डाला। इसकी एक-एक बूंद और छींटे पाने के लिए श्रद्धालुओं में चहुंओर होड मची रही। होली कारंग और गुलाल इस तरह उडा कि ब्रह्मगिरि पर्वत होली के रंगों में सराबोर हो गया। यह खास होली उस समय और यादगार बन गई जब रंगीली गली में लठामार होली खेल रहे हुरियारों और हुरियारिनों पर आसमान से पुष्पों की बरसा होने लगी। यह बरसात दिल्ली से आए एक श्रद्धालु ने हेलीकाप्टर से कराई थी। उस क्षण ने माहौल में और चार चांद लगा दिए।

Sunday, February 14, 2010

मौसम में दिल का धड़कना आधुनिकता का नाम वेलेंटाइन डे का नाम

निर्मेश त्यागी
ऐसे में दिल का धड़कना लाजिमी है,क्योंकि वेलेंटाइन डे है आज। युगों-युगों से बसंत का मंद समीर,खिले हुए फूल,गुनगुनाती धूप और मन में उठती मीठी सी तरंग। ऐसे माहौल में दिल का धड़कना तो लाजिमी ही है। यह अलग बात है कि खुशगवार मौसम की वजह से मन में आने वाले मुहब्बत से भरे इस सुरीले अहसास को आधुनिकता ने वेलेंटाइन डे का नाम दे दिया गया है। कुछ ऐसा ही बताते हैं मानव शरीर पर मौसम के बदलावों का अध्ययन करने वाले आयुर्वेदाचार्य। आयुर्वेदाचार्यों के मुताबिक दरअसल प्यार का दिन यानि वेलेंटाइन डे दिल का मामला नहीं बल्कि मौसम का मामला है।
आयुर्वेदाचार्य बताते हैं कि बसंत ऋतु में चलने वाली मंद समीर रोम छिद्रों के माध्यम से सीधे शरीर के भीतर प्रवेश कर जाती है। इससे शरीर के भीतर स्फूर्ति का अहसास होता है। आयुर्वेदाचार्यों का कहना हैै कि बसंत का मौसम ऐसा प्रभाव डालता है कि मानव प्रेम भावनाओं के वशीभूत होकर कार्य करने लगता है। शरीर की अग्रि भी इस दौरान काफी प्रबल हो जाती हैै। अग्रि के प्रबल होने के बाद मनुष्य भी पशु-पक्षियों की तरह विपरीत लिंग की ओर आकर्षित होता है। पाचन बढिय़ा हो जाता हैै। भूख ज्यादा लगती हैै।
प्रमुख आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ.अजय चौधरी बसंत ऋतु के शरीर पर पडऩे वाले प्रभाव के बारे में बताते हैं,कि पूरे मौसम में शरीर में धातुओं का पोषण की प्रक्रिया जारी रहती है। इसकी वजह से इनसान मानसिक तौर पर प्रेम के लिए काफी हद तक तैयार हो जाता है। डॉ.चौधरी के मुताबिक यही मुख्य वजह है,जिससे वेलेंटाइन डे बसंत में ही पड़ता हैै। युवाओं के अलावा इस ऋतु का प्रभाव बुजुर्गों पर भी पड़ता है। बुजुर्गों की कमर और पीठ दर्द से संबंधित शिकायतें काफी कम हो जाती है। गुस्सा करने वालों लोग थोड़े शांत पड़ जाते हैं और बात बात में झल्लाने वालों की झल्लाहट कम हो जाती हैै। बसंत के खुशगार मौसम का असर पशुओं व पक्षियों पर भी पड़ता है। पशु चिकित्सक डॉ.एच.के.शर्मा के अनुसार मौसम में आए बदलाव के कारण जानवरों की उग्रता भी कम होगी और वे बजाय मारने,काटने,भैंकने के प्यार प्रदर्शित करते हैं।

Friday, February 12, 2010

वेलेन्टाइन डे बनाम प्यार में धोखा.......... ( सावधान लड़कियां )

इन दिनों बाजार जाकर काफी शुकून मिल रहा हैं , ऐसा लगता है मानों कि किसी बगीचे में आ गये हों , चारों ओर गुलाबी खुशबू फैली है । तरह तरह के स्टाइल में सजे गुलाब के फूलों को देख प्रसन्नता होती है , वैसे तो आम दिनों में इन गुलाबों की कीमत पांच रूपये के आस पास होती है पर इस खास मौके पर ये ३० रूपये से लेकर १००० रूपये तक के हैं । इसलिए देखकर ही अच्छा लग रहा है.............. खरीदना क्या ? जब कभी भी मन होता चाय के बहाने बाजार की तरफ रूख कर लेते हैं । कारण तो आप भी पता ही है भाई , हम बेरोजगार जो ठहरे । महंगाई ने पहले ही दाल रोटी को हमसे दूर कर दिया है ऐसे में भला गुलशन में गुलाब कैसे गुलजार हो सकता है । इस समय तो अपना गुलशन गुलजार जी के गाने से( इब्ने बतूता) ही महक रहा है ।
बाजार में जाने पर पता चल रहा है कि लैला मजनू आफर भी चल रहा है जिसमें काफी हट, पिज्जा हट सबसे आगे हैं । पर मेरे लिए यह सब कहां ? अपनी तो वही पुरानी राम कहानी जो बनाओगे वही खाने को मिलेगा । वैसे भी काफी और चाय के दाम ने मिठास पहले ही गायब कर दी है । पर आप सभी जोड़ें में जाकर इसका भरपूर आनंद ले सकते हैं ।
वैसे भी अगर बाजार किसी त्यौहार को महत्तव न दे....... तो वह फीका ही नजर आता है । वेलेन्टाइन डे को बाजार ने सर आंखों पर लिया है , इसलिए इसका खुमार टीन ऐजर्स पर चढ़कर बोल रहा है । मीडिया की माने तो ड्रग्स और गर्भनिरोधक दवाओं की बिक्री में भी इजाफा हुआ है । कंडोम भी आम दिनों की तुलना में ४० फीसदी अधिक बिक रहा है । वैसे इस तरह से एक फायदा तो जरूर रहेगा जो कि शारीरिक संबध को साफ सुथरा बनाया जा सकेगा । वे लड़किया जरूर सावधान रहें जो इस तरह के विचार की नहीं है। कामोत्तेजक दवाओं को पानी , काफी या किसी और तरल में मिलाकर आपको पिलाया जा सकता है । वैसे प्रेम विश्वास का रिश्ता पर सावधानी आपके हाथ हैं । वर्ना धोखा भी हो सकता है ।

Sunday, January 31, 2010

...जहां सात फेरों को तरसते हैं पुरुष

अभी तक तो बेटी के पिता को ही अपनी लड़की के विवाह की फिक्र सताती थी मगर शिवपुरी जिले में ऐसे एक दो नहीं, बल्कि पूरे दो दर्जन से अधिक गांव हैं, जहां कुंवारे युवकों की पूरी फौज मौजूद है और इन गांवों को कुंआरों के गांव के नाम से पुकारा जाने लगा है। दरअसल इन गांवों में फ्लोराइड युक्त पानी होने के कारण लोग अस्थि विकार का शिकार हो जाते हैं। इसी वजह से आसपास के गांवों के लोग इन गांवों में अपनी बेटी ब्याहने से कतराते हैं। इन गांवों के लोग अपनी लड़कियों की शादी छोटी उम्र में करके उन्हें तो इस बीमारी से बचा लेते हैं, लेकिन सेहरा बांधने की हसरत में उनके लड़कों की उम्र ढल रही है। सूत्रों का कहना है कि फ्लोराइड युक्त पानी वाले गांवों की संख्या और भी तेजी से बढ़ रही है। फ्लोरोसिस से पीडि़त गांवों में लोग अपनी बेटियां ब्याहने से कतराते हैं और पिछले लंबे समय से यहां यह स्थिति देखी जा रही है। अब तो हालत यह है कि लोग इन गांवों को कुंआरों के गांव के नाम से भी पुकारने लगे हैं।शिवपुरी जिले के नरवर और करैरा विकासखंड अंतर्गत मौजूद इन गांवों के पानी में फ्लोरोसिस का जहर घुला हुआ है। ग्राम हथेड़ा, मिहावरा, गोकुंदा, टोडा आदि में फ्लोराइड के आधिक्य ने पानी को विषैला कर डाला है। इस विषैले पानी के सेवन से लोग अस्थि विकृति के शिकार हो रहे है।
इस बीमारी की चपेट में आने वाले लोगों में जवानी में ही बुढ़ापे की झलक साफ देखने को मिलती है। दांतों की कतारें बदरंग हो जाती है और कम उम्र में ही दांत गिरने लगते हैं। इन गांवों में अपाहिजों की तादाद भी तुलनात्मक तौर पर चौंकाने वाली है।बकौल डा। डी के सिरोठिया, फ्लोरोसिस एक दफा अपना प्रभाव जमा ले तो फिर उससे निजात मिलना असंभव सा कार्य है। इसके लिए तो यही कहा जाएगा कि फ्लोरोसिस से बचाव ही इसका इलाज है। उन्होंने बताया कि फ्लोराइड की मात्रा फूलपुर, हतेड़ा आदि क्षेत्रों में तो 5 पीपीएम तक है जबकि एक से 1.5 पीपीएम तक फ्लोराइड की मात्रा पानी में मानव उपयोगार्थ स्वीकार्य है। नरवर के टुकी क्षेत्र के गोपाल यादव का कहना है कि वह दो जवान बेटियों का बाप है परंतु हतेडा, गोकुंदा आदि ग्रामों में लड़के होते हुए भी वह अपनी बेटियों की शादी इन गांवों में नहीं करेगा। उसका कहना है कि वहां उनकी बेटी की ही नहीं, उसकी भावी संतानों की भी जिंदगी खराब हो जाएगी।फ्लारोसिस की दहशत ने लड़की वालों को इस कदर अपनी जकड़ में ले रखा है कि यहां के पूरे पूरे गांव शहनाई की आवाज को तरस गए हैं। ग्राम फूलपुर के कोमलसिंह, मंशाराम, राजाराम सिंह आदि के घर जवान बेटे मौजूद हैं, जिनकी शादी की उम्र निकलती जा रही है, इनकी शादी की सभी संभावनाएं फीकी है। राजाराम निराश भाव से कहता है कि अब तो उसने रिश्तों की बाट देखना भी बंद कर दिया है।
फूलपुर टोडा हथेडा, महावरा, जरावनी, गोकुंदा आदि में महिला पुरुष अनुपात बेहद असंतुलित है। यहां की बेटियों की शादी तो कम उम्र में आसानी से हो जाती है, लेकिन युवकों का दुल्हन नहीं मिल पाती।
ग्रामीण हरज्ञान पाल का कहना है कि फ्लोरोसिस यहां दशकों से है, किन्तु जब से प्रचार माध्यमों ने प्रचारित किया है तभी से गांवों में कुंआरों की संख्या लगातार बढ़ने लगी हैं। फ्लोरोसिस नामक बीमारी के फैलाव का मुख्य और एक मात्र कारण इन गांवों में पानी के स्त्रोतों का फ्लोराइड प्रभावित होना है। फ्लोराइड ने लोगों के अस्थि तंत्र, तांत्रिका तंत्र और अन्य अंगों को प्रभावित कर डाला है।
स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग ने इस त्रासदी से निपटने के लिए स्थान-स्थान पर डी फ्लोरीडेशन संयत्र स्थापित करने के अलावा नल-जल योजनाओं के जरिए दीगर स्थानों से पानी लाए जाने का प्रयास किया है। क्षेत्र के 30 से अधिक हैंडपंप फ्लोराइड की स्वीकार्य मात्र से अधिकता वाले जल की उपलब्धता के कारण बंद कर लाल रंग से चिंहित कर दिए गए हैं।रतिराम यादव कहता है कि सब कुछ किया जा रहा है परंतु गांव के बारे में जो धारणा बन चुकी है उसे बदल पाना संभव नहीं है। सरकार हमारी शादी का प्रबंध करने के लिए भी कुछ करे तो बात बने।
साभार mediaclubofindia

Saturday, January 30, 2010

पहला प्यार
ममत्व की तुतलाती मातृभाषा में..
कुछ ही वर्ष रही वह जीवन में
दूसरा प्यार
बहन की कोमल छाया में

एक सेनेटोरियम की उदासी तक

फिर नासमझी की भाषा में
एक लौ को पकड़ने की कोशिश में
जला बैठा था अपनी अंगुलियां

एक परदे के दूसरी तरफ़
खिली धूप में खिलता गुलाब
बेचैन शब्द
जिन्हें होंठों पर लाना भी गुनाह था

धीरे-धीरे जाना
प्यार की और भी भाषाएं हैं दुनिया में
देशी-विदेशी

और विश्वास किया कि प्यार की भाषा
सब जगह एक ही है
लेकिन जल्दी ही जाना
कि वर्जनाओं की भाषा भी एक ही है

एक-से घरों में रहते हैं
तरह-तरह के लोग
जिनसे बनते हैं
दूरियों के भूगोल..

अगला प्यार
भूली-बिसरी यादों की
ऐसी भाषा में जिसमें शब्द नहीं होते
केवल कुछ अधमिटे अक्षर
कुछ अस्फुट ध्वनियां भर बचती हैं
जिन्हें किसी तरह जोड़कर
हम बनाते हैं