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Monday, August 4, 2008
पाँच लाख का इनामी डाकू ठोकिया ढेर
सल्लू के साथ नहीं दिखेंगी कैटरीना?
सलमान खान ने अपनी गर्लफ्रेंड कैटरीना कैफ को इंप्रेस करने के लिए उनके बर्थडे पर बेहतरीन पार्टी का आयोजन किया था, लेकिन उनका यह दांव उलटा पड़ गया। सूत्रों की मानें, तो उस दिन शाहरुख खान और सलमान के बीच हुई लड़ाई से कैटरीना काफी अपसेट हैं, इसलिए उन्होंने आगे सलमान के साथ काम नहीं करने का फैसला किया है। अगर कैटरीना अपना फैसला नहीं बदलती हैं, तो सुभाष घई की आने वाली फिल्म 'युवराज' इस जोड़ी की साथ में आखिरी फिल्म होगी।
वैसे, इन दिनों 'युवराज' की शूटिंग कर रहे कैटरीना और सलमान को देखकर बाकी की टीम बेहद हैरान है। दरअसल, सेट्स पर अब दोनों में जरा भी बातचीत नहीं होती। सूत्र बताते हैं कि पहले दोनों बेहद फ्रेंडली रहते थे, लेकिन ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है, जब इस कपल ने आपस में जरा भी बातचीत नहीं की है। बल्कि हरेक शॉट के बाद दोनों अपनी वैनिटी वैन में चले जाते हैं। और तो और दोनों ने एक दूसरे से हैलो-हाय भी नहीं की।
आखिर वे दोनों बात क्यों नहीं कर रहे हैं? सूत्र कहते हैं कि पिछले दिनों पार्टी में हुए झगड़े के बाद कैटरीना ने सलमान से होस्ट होने के नाते शाहरुख से माफी मांगने के लिए कहा था। उन्होंने यह भी कहा कि सारा झगड़ा सलमान की गलती की वजह से हुआ है, जबकि सलमान ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। इस वजह से कैटरीना ने उसने बातचीत बंद करने और साथ काम नहीं करने का फैसला किया है। अब देखना यह है कि कैटरीना के बाद सलमान का साथ निभाने कौन-सी हीरोइन आगे आती है।
वैसे, इन दिनों 'युवराज' की शूटिंग कर रहे कैटरीना और सलमान को देखकर बाकी की टीम बेहद हैरान है। दरअसल, सेट्स पर अब दोनों में जरा भी बातचीत नहीं होती। सूत्र बताते हैं कि पहले दोनों बेहद फ्रेंडली रहते थे, लेकिन ऐसा पहली बार देखने में आ रहा है, जब इस कपल ने आपस में जरा भी बातचीत नहीं की है। बल्कि हरेक शॉट के बाद दोनों अपनी वैनिटी वैन में चले जाते हैं। और तो और दोनों ने एक दूसरे से हैलो-हाय भी नहीं की।
आखिर वे दोनों बात क्यों नहीं कर रहे हैं? सूत्र कहते हैं कि पिछले दिनों पार्टी में हुए झगड़े के बाद कैटरीना ने सलमान से होस्ट होने के नाते शाहरुख से माफी मांगने के लिए कहा था। उन्होंने यह भी कहा कि सारा झगड़ा सलमान की गलती की वजह से हुआ है, जबकि सलमान ने माफी मांगने से साफ इनकार कर दिया। इस वजह से कैटरीना ने उसने बातचीत बंद करने और साथ काम नहीं करने का फैसला किया है। अब देखना यह है कि कैटरीना के बाद सलमान का साथ निभाने कौन-सी हीरोइन आगे आती है।
धोनी को राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार
नई दिल्ली : सितंबर 2007 में दक्षिण अफ्रीका में हुए ट्वेंटी 20 वर्ल्ड कप में अपने नेतृत्व में टीम इंडिया को खिताब जिताने वाले महेंद्र सिंह धोनी को इस साल के राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार के लिए चुना गया है।
धोनी देश का सबसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार पाने वाले दूसरे क्रिकेटर होंगे। उनसे पहले क्रिकेट के लिए खेल रत्न अवॉर्ड सिर्फ सचिन तेंडुलकर को ही मिला है। टीम इंडिया के वन डे और ट्वेंटी 20 टीम के कप्तान धोनी को पिछले साल हुए ट्वेंटी 20 वर्ल्ड कप में बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए इस अवॉर्ड के लिए चुना गया है।
विकेटकीपर बैट्समन के रूप में धोनी 2004 में टीम इंडिया का हिस्सा बने और उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ अपना पहला वन डे मैच खेला। धोनी अब तक 110 वन डे खेलकर 3382 रन बना चुके हैं जबकि 29 टेस्ट मैचों में उन्होंने 1418 रन जोड़े हैं। उन्होंने वन डे मैचों में 4 और टेस्ट मैचों में एक शतक जड़ा है। ट्वेंटी 20 वर्ल्ड कप में युवा सदस्यों से भरी टीम को जीत के पायदान पर पहुंचाने में धोनी का अहम योगदान रहा।
धोनी मुश्किल से मुश्किल हालात में धैर्य बनाए रखने के लिए मशहूर हैं। अपनी लीडरशिप क्वालिटी की बदौलत ही धोनी आईपीएल के सबसे महंगे खिलाड़ी बनकर उभरे। चेन्नै सुपरकिंग्स ने धोनी के लिए 15 लाख डॉलर की सबसे ऊंची बोली लगाई थी।
फिलहाल धोनी भारत श्रीलंका टेस्ट सीरीज में टीम का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने लगातार हो रहे मैचों की वजह से हुई थकान का हवाला देते हुए श्रीलंका दौरे पर न जाने का फैसला किया था।
धोनी देश का सबसे प्रतिष्ठित खेल पुरस्कार पाने वाले दूसरे क्रिकेटर होंगे। उनसे पहले क्रिकेट के लिए खेल रत्न अवॉर्ड सिर्फ सचिन तेंडुलकर को ही मिला है। टीम इंडिया के वन डे और ट्वेंटी 20 टीम के कप्तान धोनी को पिछले साल हुए ट्वेंटी 20 वर्ल्ड कप में बेहतरीन प्रदर्शन को देखते हुए इस अवॉर्ड के लिए चुना गया है।
विकेटकीपर बैट्समन के रूप में धोनी 2004 में टीम इंडिया का हिस्सा बने और उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ अपना पहला वन डे मैच खेला। धोनी अब तक 110 वन डे खेलकर 3382 रन बना चुके हैं जबकि 29 टेस्ट मैचों में उन्होंने 1418 रन जोड़े हैं। उन्होंने वन डे मैचों में 4 और टेस्ट मैचों में एक शतक जड़ा है। ट्वेंटी 20 वर्ल्ड कप में युवा सदस्यों से भरी टीम को जीत के पायदान पर पहुंचाने में धोनी का अहम योगदान रहा।
धोनी मुश्किल से मुश्किल हालात में धैर्य बनाए रखने के लिए मशहूर हैं। अपनी लीडरशिप क्वालिटी की बदौलत ही धोनी आईपीएल के सबसे महंगे खिलाड़ी बनकर उभरे। चेन्नै सुपरकिंग्स ने धोनी के लिए 15 लाख डॉलर की सबसे ऊंची बोली लगाई थी।
फिलहाल धोनी भारत श्रीलंका टेस्ट सीरीज में टीम का हिस्सा नहीं हैं। उन्होंने लगातार हो रहे मैचों की वजह से हुई थकान का हवाला देते हुए श्रीलंका दौरे पर न जाने का फैसला किया था।
Sunday, August 3, 2008
यह यात्रा आपको श्रद्धालु बना देती है
युधिष्ठिर लाल कक्कड़
दिल्ली से बद्रीनाथ जाने के लिए हरिद्वार से उत्तरकाशी और फिर आगे के सफर के लिए एक और पड़ाव रास्ते में करना पड़ता है। इसलिए हम एक रोज पहले ही दिल्ली से चल कर उत्तरकाशी आ पहुंचे थे। रात में हमने वहीं डेरा डाला। दूसरे दिन उत्तरकाशी से हम सवेरे 6 बजे बद्रीनाथ के लिए रवाना हो गए। रास्ता पूरा पहाड़ी है। यहां पहाड़ों के बीच बनी खाइयों में पानी ही पानी है। टिहरी बांध का पानी यहां कई किलोमीटर तक फैला है। यह पानी करीब तीन - चार घंटे तक साथ रहता है। बांध पर पहुंचते हैं तो मन प्रसन्न हो उठता है। एक ओर अथाह हरा नीला पानी ही पानी , तो दूसरी ओर शानदार इंजीनियरिंग का कमाल टिहरी बांध और उस पर लगे बिजली उत्पादन के संयंत्र , सब कुछ बहुत ही जीवंत लगता है !
रास्ते में करीब 2 बजे श्रीनगर आया। बड़ा कस्बा है। यहां सब सुविधाएं हैं। इसके बाद करीब आठ बजे नंदग्राम , चमोली और फिर पीपलकोठी पहुंचे। पीपलकोठी में हमने रात बिताई। दिन में धूप थी,पर अब बारिश हो रही थी। खबर थी कि पिछली रात बद्रीनाथ में भी बर्फबारी हुई थी,सुनकर मन खुशी से झूम उठा। हम पीपलकोठी से अगले दिन सवेरे करीब आठ बजे रवाना हुए। मौसम साफ था। बारिश बन्द हो चुकी थी और बादल भी छंट चुके थे,लेकिन सूरज की रोशनी अब भी धरती तक या यूं कहें कि पहाड़ों के बीच बनी घाटियों में नहीं पहुंच पा रही थी,क्योंकि पहाड़ों की ऊंचाई ज्यादा थी। दूर कहीं - कहीं बर्फीले पहाड़ भी नजर आ रहे थे।
जोशीमठ हम करीब सवा नौ बजे पहुंचे। यह एक अच्छा कस्बा है। यहां बद्रीनाथ जी की शीतकालीन गद्दी है। आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां ज्योतिर्मठ की स्थापना की , इसलिए आज इसे जोशीमठ के नाम से पुकारा जाता है। कस्बा चारों ओर ऊंचे - ऊंचे पहाड़ों से घिरा है। इसके लिए करीब एक घंटे के सफर के बाद गोविंद घाट आता है। यहां से हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी का रास्ता है। दिल कर रहा था कि उधर चला जाए लेकिन हमारे पास वक्त कम था और इसके लिए करीब 18 किलोमीटर का पैदल पहाड़ी रास्ता भी तय करना पड़ता है। गोविंद घाट से अब बद्रीनाथ धाम की दूरी मात्र 20 किलोमीटर थी,इसीलिए मन में रोमांच और खुशी मचल रही थी।
चोटियों पर बर्फ और नीचे पहाड़ियों पर खिली धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। बस स्टैंड से बद्रीनाथ धाम पुल पार है। यहां अच्छा खासा बाजार है , दुकानें हैं और उनके बीच बस्ती है। मुख्य मंदिर इसी आबादी के बीच स्थित है। मंदिर की भव्यता और विशालता देखते ही बनती है। मंदिर में बद्री भगवान यानी विष्णु भगवान की मूर्ति है। माहौल में कभी - कभी भक्तों के जयकारें गूंज उठते हैं,ब्रदी विशाल की जय !
मंदिर के नीचे अलकनंदा का साफ निर्मल बर्फीला पानी कलकल करता हुआ गंगा में मिलने को आगे बढ़ रहा था , तो पार्श्व में रुई के माफिक बर्फीली गेंदें बिखरी नजर आ रही थीं , जिससे मंदिर की छटा और भी प्यारी लग रही थी। मंदिर के निकट नीचे की ओर कुदरत का करिश्मा यानी गर्म और गंधकयुक्त पानी के तप्त कुंड हैं , जिनमें से भाप का गुबार उठता रहता है। पर्यटक और यात्री गण यहां नहाने का खूब लुत्फ उठाते हैं। कहते हैं इस गंधक युक्त पानी के स्नान से कई चर्म रोग दूर हो जाते हैं। ठंड में नहाने के लिए यह गर्म पानी वैसे भी सुहावना लगता है। हमने भी यहां नहाने का खूब आनंद उठाया।
यहां का मौसम कभी भी बदल जाता है। धूप और बादलों की लुका - छिपी चलती रहती है। ठंडी हवाएं भी खूब चलती हैं। मौसम काफी सर्द रहता है। शीत ऋतु में तो यहां का तापमान शून्य से भी कम हो जाता है और पूरा बद्रीनाथ हिमाच्छादित रहता है। उम्मीद थी कि यहां सिर्फ एक कंबल और एक रजाई में ठंड लगेगी,पर हमारा काम चल गया।
सवेरे उठे तो आज मौसम और साफ था। हम में से कुछ लोगों ने तप्त कुंड में ही स्नान किया। धर्मशाला में भी 10 रुपये में गर्म पानी की बाल्टी की आवाज लगाता एक लड़का घूम रहा था। खैर,हम जल्द तैयार होकर 4 किलोमीटर दूर बसे माणा ( मणिभदपुर ) गांव पहुंचे। यह भारत - तिब्बत सीमा का अंतिम गांव है। अलकनंदा के तट पर बसा यह गांव ग्रामीण संस्कृति से ओत-प्रोत,बहुत ही खूबसूरत और शांत है। उस रोज पहाड़ों पर पूरी तरह बर्फ पसरी थी , जिस पर अब सूरज की किरणें पड़ने लगी थीं। इसकी चमचमाहट आंखों को चुंधिया रही थीं।
गांव की तिब्बती चीनी चेहरों वाली कई महिलाएं अपने पीछे टोकरियां लिए सवेरे काम को निकल रही थीं। कुछ अपनी ही छतों पर भेड़ों की ऊन सुखा रही थीं। ग्रामीण परिदृश्य और अलसाया सौंदर्य बड़ा ही मनोरम था।
यहां हमने व्यास गुफा,गणेश गुफा आदि देखी। व्यास गुफा के बारे में कहते हैं कि यहीं महर्षि वेदव्यास ने वेदों की ऋचाओं और मंत्रों का संग्रह कर उन्हें चार भागों में बांटा। भारत-तिब्बत की सीमा पर बनी अंतिम चाय की दुकान भी यहीं व्यास गुफा के निकट है। इच्छा हो रही थी कि यहां चाय पी जाए,पर हमारे पास समय कम था। हमें नौ बजे वाले गेट से बद्रीनाथ से निकलना था। गेट तक पहुंचते-पहुंचते सवा नौ हो गए,सो जल्दी करते-करते भी हम 15 मिनट लेट थे,अब अगला गेट साढे़ ग्यारह बजे खुलना था। ध्यान रहे कि जोशीमठ तक वन वे होने की वजह से यहां गेट सिस्टम है।
साढे़ ग्यारह बजे वाले गेट से निकल कर शाम सात बजे हम रुदप्रयाग पहुंचे। यहां हमने रात धर्मशाला में बिताई। रुदप्रयाग एक छोटा पर खास नगर है। यह तीन पहाड़ी जनपदों को मिलाता है और सबसे महत्वपूर्ण है यहां अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम। संगम के किनारे ऊंचाई पर रुदनाथ का प्राचीन मंदिर है। कहते हैं , यहां महर्षि नारद ने कई सालों तक तपस्या की थी। मंदिर के नीचे संगम पर चामुंडा मां का मंदिर है। यहां संगम में दोनों नदियों के जल को मिलते हुए आसानी से देखा जा सकता है , दोनों का रंग अलग - अलग है।
यहां से सवेरे आठ बजे रवाना होकर बारह बजे हम ऋषिकेश पहुंचे। ऋषिकेश तक के इस सफर में रिवर रॉफ्टिंग का लुफ्त उठाते पर्यटक भी मिले , जिन्हें देखकर मन रोमांचित हो उठा। इनके लिए रास्ते में कई जगह नदी किनारे कैम्प भी बने हैं। खैर ऋषिकेश में हम करीब चार - पांच घंटे घूमे और फिर शाम करीब सात बजे हम वापस हरिद्वार आ गए।
सचमुच बद्रीनाथ की यह यात्रा और यह सफर सब कुछ सुहावना था। आंखों को भानेवाला और दिल को सुकून देने वाला। आप धार्मिक न हों तो भी प्रकृति आपको श्रद्धालु बना देती है। एक बार आप भी यहां अवश्य जाएं।
दिल्ली से बद्रीनाथ जाने के लिए हरिद्वार से उत्तरकाशी और फिर आगे के सफर के लिए एक और पड़ाव रास्ते में करना पड़ता है। इसलिए हम एक रोज पहले ही दिल्ली से चल कर उत्तरकाशी आ पहुंचे थे। रात में हमने वहीं डेरा डाला। दूसरे दिन उत्तरकाशी से हम सवेरे 6 बजे बद्रीनाथ के लिए रवाना हो गए। रास्ता पूरा पहाड़ी है। यहां पहाड़ों के बीच बनी खाइयों में पानी ही पानी है। टिहरी बांध का पानी यहां कई किलोमीटर तक फैला है। यह पानी करीब तीन - चार घंटे तक साथ रहता है। बांध पर पहुंचते हैं तो मन प्रसन्न हो उठता है। एक ओर अथाह हरा नीला पानी ही पानी , तो दूसरी ओर शानदार इंजीनियरिंग का कमाल टिहरी बांध और उस पर लगे बिजली उत्पादन के संयंत्र , सब कुछ बहुत ही जीवंत लगता है !
रास्ते में करीब 2 बजे श्रीनगर आया। बड़ा कस्बा है। यहां सब सुविधाएं हैं। इसके बाद करीब आठ बजे नंदग्राम , चमोली और फिर पीपलकोठी पहुंचे। पीपलकोठी में हमने रात बिताई। दिन में धूप थी,पर अब बारिश हो रही थी। खबर थी कि पिछली रात बद्रीनाथ में भी बर्फबारी हुई थी,सुनकर मन खुशी से झूम उठा। हम पीपलकोठी से अगले दिन सवेरे करीब आठ बजे रवाना हुए। मौसम साफ था। बारिश बन्द हो चुकी थी और बादल भी छंट चुके थे,लेकिन सूरज की रोशनी अब भी धरती तक या यूं कहें कि पहाड़ों के बीच बनी घाटियों में नहीं पहुंच पा रही थी,क्योंकि पहाड़ों की ऊंचाई ज्यादा थी। दूर कहीं - कहीं बर्फीले पहाड़ भी नजर आ रहे थे।
जोशीमठ हम करीब सवा नौ बजे पहुंचे। यह एक अच्छा कस्बा है। यहां बद्रीनाथ जी की शीतकालीन गद्दी है। आदिगुरु शंकराचार्य ने यहां ज्योतिर्मठ की स्थापना की , इसलिए आज इसे जोशीमठ के नाम से पुकारा जाता है। कस्बा चारों ओर ऊंचे - ऊंचे पहाड़ों से घिरा है। इसके लिए करीब एक घंटे के सफर के बाद गोविंद घाट आता है। यहां से हेमकुंड साहिब और फूलों की घाटी का रास्ता है। दिल कर रहा था कि उधर चला जाए लेकिन हमारे पास वक्त कम था और इसके लिए करीब 18 किलोमीटर का पैदल पहाड़ी रास्ता भी तय करना पड़ता है। गोविंद घाट से अब बद्रीनाथ धाम की दूरी मात्र 20 किलोमीटर थी,इसीलिए मन में रोमांच और खुशी मचल रही थी।
चोटियों पर बर्फ और नीचे पहाड़ियों पर खिली धूप बड़ी प्यारी लग रही थी। बस स्टैंड से बद्रीनाथ धाम पुल पार है। यहां अच्छा खासा बाजार है , दुकानें हैं और उनके बीच बस्ती है। मुख्य मंदिर इसी आबादी के बीच स्थित है। मंदिर की भव्यता और विशालता देखते ही बनती है। मंदिर में बद्री भगवान यानी विष्णु भगवान की मूर्ति है। माहौल में कभी - कभी भक्तों के जयकारें गूंज उठते हैं,ब्रदी विशाल की जय !
मंदिर के नीचे अलकनंदा का साफ निर्मल बर्फीला पानी कलकल करता हुआ गंगा में मिलने को आगे बढ़ रहा था , तो पार्श्व में रुई के माफिक बर्फीली गेंदें बिखरी नजर आ रही थीं , जिससे मंदिर की छटा और भी प्यारी लग रही थी। मंदिर के निकट नीचे की ओर कुदरत का करिश्मा यानी गर्म और गंधकयुक्त पानी के तप्त कुंड हैं , जिनमें से भाप का गुबार उठता रहता है। पर्यटक और यात्री गण यहां नहाने का खूब लुत्फ उठाते हैं। कहते हैं इस गंधक युक्त पानी के स्नान से कई चर्म रोग दूर हो जाते हैं। ठंड में नहाने के लिए यह गर्म पानी वैसे भी सुहावना लगता है। हमने भी यहां नहाने का खूब आनंद उठाया।
यहां का मौसम कभी भी बदल जाता है। धूप और बादलों की लुका - छिपी चलती रहती है। ठंडी हवाएं भी खूब चलती हैं। मौसम काफी सर्द रहता है। शीत ऋतु में तो यहां का तापमान शून्य से भी कम हो जाता है और पूरा बद्रीनाथ हिमाच्छादित रहता है। उम्मीद थी कि यहां सिर्फ एक कंबल और एक रजाई में ठंड लगेगी,पर हमारा काम चल गया।
सवेरे उठे तो आज मौसम और साफ था। हम में से कुछ लोगों ने तप्त कुंड में ही स्नान किया। धर्मशाला में भी 10 रुपये में गर्म पानी की बाल्टी की आवाज लगाता एक लड़का घूम रहा था। खैर,हम जल्द तैयार होकर 4 किलोमीटर दूर बसे माणा ( मणिभदपुर ) गांव पहुंचे। यह भारत - तिब्बत सीमा का अंतिम गांव है। अलकनंदा के तट पर बसा यह गांव ग्रामीण संस्कृति से ओत-प्रोत,बहुत ही खूबसूरत और शांत है। उस रोज पहाड़ों पर पूरी तरह बर्फ पसरी थी , जिस पर अब सूरज की किरणें पड़ने लगी थीं। इसकी चमचमाहट आंखों को चुंधिया रही थीं।
गांव की तिब्बती चीनी चेहरों वाली कई महिलाएं अपने पीछे टोकरियां लिए सवेरे काम को निकल रही थीं। कुछ अपनी ही छतों पर भेड़ों की ऊन सुखा रही थीं। ग्रामीण परिदृश्य और अलसाया सौंदर्य बड़ा ही मनोरम था।
यहां हमने व्यास गुफा,गणेश गुफा आदि देखी। व्यास गुफा के बारे में कहते हैं कि यहीं महर्षि वेदव्यास ने वेदों की ऋचाओं और मंत्रों का संग्रह कर उन्हें चार भागों में बांटा। भारत-तिब्बत की सीमा पर बनी अंतिम चाय की दुकान भी यहीं व्यास गुफा के निकट है। इच्छा हो रही थी कि यहां चाय पी जाए,पर हमारे पास समय कम था। हमें नौ बजे वाले गेट से बद्रीनाथ से निकलना था। गेट तक पहुंचते-पहुंचते सवा नौ हो गए,सो जल्दी करते-करते भी हम 15 मिनट लेट थे,अब अगला गेट साढे़ ग्यारह बजे खुलना था। ध्यान रहे कि जोशीमठ तक वन वे होने की वजह से यहां गेट सिस्टम है।
साढे़ ग्यारह बजे वाले गेट से निकल कर शाम सात बजे हम रुदप्रयाग पहुंचे। यहां हमने रात धर्मशाला में बिताई। रुदप्रयाग एक छोटा पर खास नगर है। यह तीन पहाड़ी जनपदों को मिलाता है और सबसे महत्वपूर्ण है यहां अलकनंदा और मंदाकिनी का संगम। संगम के किनारे ऊंचाई पर रुदनाथ का प्राचीन मंदिर है। कहते हैं , यहां महर्षि नारद ने कई सालों तक तपस्या की थी। मंदिर के नीचे संगम पर चामुंडा मां का मंदिर है। यहां संगम में दोनों नदियों के जल को मिलते हुए आसानी से देखा जा सकता है , दोनों का रंग अलग - अलग है।
यहां से सवेरे आठ बजे रवाना होकर बारह बजे हम ऋषिकेश पहुंचे। ऋषिकेश तक के इस सफर में रिवर रॉफ्टिंग का लुफ्त उठाते पर्यटक भी मिले , जिन्हें देखकर मन रोमांचित हो उठा। इनके लिए रास्ते में कई जगह नदी किनारे कैम्प भी बने हैं। खैर ऋषिकेश में हम करीब चार - पांच घंटे घूमे और फिर शाम करीब सात बजे हम वापस हरिद्वार आ गए।
सचमुच बद्रीनाथ की यह यात्रा और यह सफर सब कुछ सुहावना था। आंखों को भानेवाला और दिल को सुकून देने वाला। आप धार्मिक न हों तो भी प्रकृति आपको श्रद्धालु बना देती है। एक बार आप भी यहां अवश्य जाएं।
नारायणी शिला पर पितरों की मुक्ति का अनुष्ठान
कत मलकांबुधकर
हरिद्वार आने वाले शायद दो-चार प्रतिशत तीर्थयात्री और सैलानी ही जानते होंगे कि यहां ' नारायणी शिला ' नामक कोई ऐसा मंदिर भी है , जहां लोगों द्वारा प्रेतबाधाओं से अपनी या प्रेत योनि से अपने पितरों की मुक्ति का अनुष्ठान किया जाता है। सामान्यतया उत्तराखंड के तीर्थ हरिद्वार में होने वाले हर मेले का केंद्र यहां की पुराण प्रसिद्ध हरकी पौड़ी ही होती है। हर बारहवें साल महाकुंभ तक का मुख्य स्नान भी इसी हरकी पौड़ी पर संपन्न होता है। पर शारदीय नवरात्रों से पहले कभी आप पितृपक्ष की चतुर्दशी के दिन हरिद्वार आएं , तो पाएंगे कि उस दिन हरकी पौड़ी पर भी उतना बड़ा मेला नहीं लगता , जितना इस अल्पज्ञात मंदिर नारायणी शिला पर लगता है। मरणोत्तर अवस्था की कुशलता के लिए मेला! पूरे साल इस मंदिर में देश-विदेश से सभी जातियों-वर्णों के वे लोग आकर अनुष्ठान कराते हैं , जिन्हें कोई प्रेत बाधा है या जिनके पितरों की प्रेत योनि से मुक्ति नहीं हुई है।
नारायणी शिला मंदिर के भीतर कमल के आकार वाली एक अर्धशिला है। वहीं भगवान नारायण की भी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बाहर भी एक शिला है , जिसे प्रेतशिला कहते हैं। मंदिर के चारों ओर लोगों ने छोटे-छोटे सैकड़ों स्मृति स्थल अपने पितृपुरुषों की सद्गति और प्रसन्नता के लिए बनवाए हैं,जिनसे प्राय: पूरा मंदिर परिसर अटा पड़ा है।
मेले के दिन आस-पास के गांव-देहात से हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष अपने बड़े-बुजुर्गों और बाल-बच्चों सहित नारायणी शिला पर पहुंचते हैं। चारों तरफ उत्सव का माहौल होता है। चाट-पकौड़ी के खोमचे , चाय और पूरी-कचौडि़यों की ठेलियां , टिकुली-बिंदी , कंघी , शीशा , चोटी-रिबन आदि की अस्थायी दूकानें , बच्चों को लुभाते खिलौने और रंगबिरंगे गुब्बारे- उस दिन सब कुछ होता है हरिद्वार के इस इलाके में , जो असल में नियमित तीर्थ यात्रियों की गहमागहमी से दूर प्राय: सुनसान रहने वाला दफ्तरी और अधिकारियों का आवासीय क्षेत्र है।
पितृपक्ष की चतुर्दशी और सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें नारायणी शिला पर शीश झुकाने ले आती है। चटख रंगों के कपड़े पहने , सिर ढके या घूंघट काढ़े स्त्रियां गोद में बच्चे और हाथों में पूजा की छड़ी और थाल सजाकर , दान के लिए भोजन-वस्त्रादि लिए गांव-टोले के पारंपरिक गीत गाती हुई जब नारायणी शिला के परिसर में पहुंचती हैं , तो मानो उनका अगला जन्म भी संवर जाता है। वे वहां एक बड़ी गोल कमलाकार शिला के मंदिर में स्थापित आधे हिस्से के आगे मत्था टेककर पुरखों से आशीष मांगती हैं। मानों स्वर्ग-अपवर्ग सभी लोकों में रहने वाले पुरखे इस स्तवन से प्रसन्न होकर उन्हें बार-बार आशीष देते हैं।
आस्तिक धारा वाली हिंदू परंपरा इहलोक के साथ- साथ परलोक में भी विश्वास रखती है। मृत्यु के पश्चात अपनी-अपनी करनी के अनुसार परलोक में निवास की मान्यता भी पुनर्जन्म के सिद्धांतों के चलते खूब चली है। परलोक से तात्पर्य इस धरती , इस मृत्युलोक के अलावा अन्य लोकों से है। चौरासी लाख योनियों की चर्चा में प्रेत योनि की भी चर्चा है। माना गया है कि जो जीव वासनाओं के वशीभूत रहते हैं , वे मृत्यु के बाद भी कुछ काल तक प्रेतलोक में निवास करते हैं। प्रेतों को वायुरूप कहा गया है। भूत , पिशाच , ब्रह्माराक्षस , ब्रह्मासमंध , जिन्न या जिन्द , वेताल आदि प्रेत योनियां ही हैं। मान्यता है कि अंत्येष्टि , श्राद्ध , पिण्डदान , नारायण-नागबलि आदि विधियों से प्रेत योनि या प्रेत बाधा से उद्धार होता है। इसके लिए गया में विष्णुपद मंदिर , बदीनाथ में ब्रह्मा कपाली और हरिद्वार में नारायणी शिला पर श्राद्ध-अनुष्ठान की परंपरा है।
स्कंद पुराण में एक कथा है कि महाराक्षस गयासुर पर नारायण ने जब गदा का प्रहार किया , तो गयासुर ने उसे कमलासन पर रोका। परिणाम स्वरूप उसका शिरोभाग ब्रह्माकपाली में , मध्यभाग हरिद्वार में तथा अधोभाग गया में जा गिरा। बाद में हारे हुए गयासुर को प्रभु ने वरदान दिया कि जो व्यक्ति मुक्ति की कामना से कमलासन के इन तीनों टुकड़ों के सम्मुख जाकर अर्चना , वंदना प्रार्थना करेगा , उसकी मुक्ति अवश्य होगी।
हरिद्वार आने वाले शायद दो-चार प्रतिशत तीर्थयात्री और सैलानी ही जानते होंगे कि यहां ' नारायणी शिला ' नामक कोई ऐसा मंदिर भी है , जहां लोगों द्वारा प्रेतबाधाओं से अपनी या प्रेत योनि से अपने पितरों की मुक्ति का अनुष्ठान किया जाता है। सामान्यतया उत्तराखंड के तीर्थ हरिद्वार में होने वाले हर मेले का केंद्र यहां की पुराण प्रसिद्ध हरकी पौड़ी ही होती है। हर बारहवें साल महाकुंभ तक का मुख्य स्नान भी इसी हरकी पौड़ी पर संपन्न होता है। पर शारदीय नवरात्रों से पहले कभी आप पितृपक्ष की चतुर्दशी के दिन हरिद्वार आएं , तो पाएंगे कि उस दिन हरकी पौड़ी पर भी उतना बड़ा मेला नहीं लगता , जितना इस अल्पज्ञात मंदिर नारायणी शिला पर लगता है। मरणोत्तर अवस्था की कुशलता के लिए मेला! पूरे साल इस मंदिर में देश-विदेश से सभी जातियों-वर्णों के वे लोग आकर अनुष्ठान कराते हैं , जिन्हें कोई प्रेत बाधा है या जिनके पितरों की प्रेत योनि से मुक्ति नहीं हुई है।
नारायणी शिला मंदिर के भीतर कमल के आकार वाली एक अर्धशिला है। वहीं भगवान नारायण की भी प्रतिमा स्थापित है। मंदिर के बाहर भी एक शिला है , जिसे प्रेतशिला कहते हैं। मंदिर के चारों ओर लोगों ने छोटे-छोटे सैकड़ों स्मृति स्थल अपने पितृपुरुषों की सद्गति और प्रसन्नता के लिए बनवाए हैं,जिनसे प्राय: पूरा मंदिर परिसर अटा पड़ा है।
मेले के दिन आस-पास के गांव-देहात से हजारों की संख्या में स्त्री-पुरुष अपने बड़े-बुजुर्गों और बाल-बच्चों सहित नारायणी शिला पर पहुंचते हैं। चारों तरफ उत्सव का माहौल होता है। चाट-पकौड़ी के खोमचे , चाय और पूरी-कचौडि़यों की ठेलियां , टिकुली-बिंदी , कंघी , शीशा , चोटी-रिबन आदि की अस्थायी दूकानें , बच्चों को लुभाते खिलौने और रंगबिरंगे गुब्बारे- उस दिन सब कुछ होता है हरिद्वार के इस इलाके में , जो असल में नियमित तीर्थ यात्रियों की गहमागहमी से दूर प्राय: सुनसान रहने वाला दफ्तरी और अधिकारियों का आवासीय क्षेत्र है।
पितृपक्ष की चतुर्दशी और सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्रद्धालुओं की आस्था उन्हें नारायणी शिला पर शीश झुकाने ले आती है। चटख रंगों के कपड़े पहने , सिर ढके या घूंघट काढ़े स्त्रियां गोद में बच्चे और हाथों में पूजा की छड़ी और थाल सजाकर , दान के लिए भोजन-वस्त्रादि लिए गांव-टोले के पारंपरिक गीत गाती हुई जब नारायणी शिला के परिसर में पहुंचती हैं , तो मानो उनका अगला जन्म भी संवर जाता है। वे वहां एक बड़ी गोल कमलाकार शिला के मंदिर में स्थापित आधे हिस्से के आगे मत्था टेककर पुरखों से आशीष मांगती हैं। मानों स्वर्ग-अपवर्ग सभी लोकों में रहने वाले पुरखे इस स्तवन से प्रसन्न होकर उन्हें बार-बार आशीष देते हैं।
आस्तिक धारा वाली हिंदू परंपरा इहलोक के साथ- साथ परलोक में भी विश्वास रखती है। मृत्यु के पश्चात अपनी-अपनी करनी के अनुसार परलोक में निवास की मान्यता भी पुनर्जन्म के सिद्धांतों के चलते खूब चली है। परलोक से तात्पर्य इस धरती , इस मृत्युलोक के अलावा अन्य लोकों से है। चौरासी लाख योनियों की चर्चा में प्रेत योनि की भी चर्चा है। माना गया है कि जो जीव वासनाओं के वशीभूत रहते हैं , वे मृत्यु के बाद भी कुछ काल तक प्रेतलोक में निवास करते हैं। प्रेतों को वायुरूप कहा गया है। भूत , पिशाच , ब्रह्माराक्षस , ब्रह्मासमंध , जिन्न या जिन्द , वेताल आदि प्रेत योनियां ही हैं। मान्यता है कि अंत्येष्टि , श्राद्ध , पिण्डदान , नारायण-नागबलि आदि विधियों से प्रेत योनि या प्रेत बाधा से उद्धार होता है। इसके लिए गया में विष्णुपद मंदिर , बदीनाथ में ब्रह्मा कपाली और हरिद्वार में नारायणी शिला पर श्राद्ध-अनुष्ठान की परंपरा है।
स्कंद पुराण में एक कथा है कि महाराक्षस गयासुर पर नारायण ने जब गदा का प्रहार किया , तो गयासुर ने उसे कमलासन पर रोका। परिणाम स्वरूप उसका शिरोभाग ब्रह्माकपाली में , मध्यभाग हरिद्वार में तथा अधोभाग गया में जा गिरा। बाद में हारे हुए गयासुर को प्रभु ने वरदान दिया कि जो व्यक्ति मुक्ति की कामना से कमलासन के इन तीनों टुकड़ों के सम्मुख जाकर अर्चना , वंदना प्रार्थना करेगा , उसकी मुक्ति अवश्य होगी।
विवाहित ही नहीं, कुंवारी कन्याएं भी मनातीं हैं हरियाली तीज
सावन के महीने में शिव की उपासना का सोमवार को तीसरा सोमवार और सुवर्ण गौरी व्रत है। साल में तीन तीजें मनाई जाती हैं- हरियाली तीज, कजरी तीज और हरतालिका तीज। लेकिन इनके मनाए जाने के महीने अलग-अलग हैं। सोमवार को हरियाली तीज है।
यह मुख्य रूप से महिलाओं का त्योहार है। इस दिन कुछ स्त्रियां परिवार में सुख-शांति के लिए व्रत भी रखती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भोजन ग्रहण करती हैं, हालांकि व्रत रखना जरूरी नहीं होता। इसी तरह यह वाली तीज सिर्फ विवाहित स्त्रियाँ ही नहीं, बल्कि कुमारी कन्याएँ भी मना सकती हैं। नवविवाहित और सुहागिन स्त्रियां अपने मायके में इस त्योहार को मनाती हैं। उनको मायके वालों की तरफ से वस्त्र, मिष्ठान और द्रव्य आदि से नवाजा जाता है। जिन युवतियों की शादी तय हो जाती है, उन्हें उनके ससुरालियों की ओर से उपहार आदि भेंट किए जाते हैं।
हरियाली तीज मुख्यत: धरती पर छाई लहलहाती फसल की खुशी और अच्छी पैदावार की कामना से मनाई जाती है। इस मौके पर स्त्रियां हरे रंग के परिधान पहनती हैं। इस तीज पर मेहंदी का खास महत्व है। वे अपने हाथों पर मेहंदी रचाती हैं और हरी चूड़ियां डालती हैं। विवाहित और अविवाहित सभी युवतियां सहेलियों के साथ झूलों पर झूलती हुई सावन से संबंधित गीत गाती हैं। ये गीत सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सभी तरह के प्रसंगों से सराबोर होते हैं।
अब शहरों में भी इस मौके पर तीज मेलों का आयोजन किया जाने लगा है। शहरी मेलों में तो झूले और खानपान की दुकानें ही मुख्य आकर्षण होती हैं। हरियाली तीज के एक दिन पहले महिलाएं सिंधारा त्योहार मनाती हैं। इसका नवविवाहिता स्त्रियों के लिए विशेष महत्व है। शादी के बाद पहले सिंधारा पर उन्हें अच्छे परिधान और गहने आदि भेंट किए जाते हैं।
वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में इस दिन कृष्ण और राधा की स्तुति और आराधना की जाती है। वृंदावन में यह त्योहार जन्माष्टमी तक मनाया जाता है। माना जाता है कि बाल्यकाल में कृष्ण, राधा को झूला झुलाते थे और सभी गोपिकाएं उनका साथ देती थीं। कृष्ण भक्त उमंग और खुशी के साथ यह त्योहार मनाते हैं। साल में केवल हरियाली तीज के दिन कृष्ण को झुलाने के लिए सोने का झूला तैयार किया जाता है। मंदिर में पूजा के बाद श्रद्धालुओं पर जल छिड़का जाता है, जो यह दर्शाता है कि अब मॉनसून पूरे यौवन पर है। वैसे यह त्योहार दिल्ली, राजस्थान, यूपी और एमपी में खासतौर से मनाया जाता है।
राजस्थान में शिव और पार्वती की पूजा का रिवाज है। गुजरात और महाराष्ट्र में भी महिलाएं राजस्थान की रीति-रिवाज का ही अनुसरण करती हैं। गुजरात में इस मौके पर गरबा नृत्य करती हुई स्त्रियां पार्वती की स्तुति में गीत गाती हैं। शिव पुराण के अनुसार हरियाली तीज के दिन ही शंकर और पार्वती का मिलन हुआ था। हरियाली तीज पर वैसे तो कई जगह मेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन जयपुर (राजस्थान) का मेला विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
मंगलवार को मुस्लिम महीना शाबान शुरू होगा। बुधवार को कल्कि जयंती है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि त्रेता में राजा परीक्षित के शासन काल में ही कलियुग ने अपना स्थान जमा लिया था। कलियुग में आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए विष्णु पुन: भगवान कल्कि के रूप में जन्म लेंगे। उनका वाहन घोड़ा होगा। कलियुग में कर्म के आधार पर ही मनुष्य को गति मिलेगी, ऐसा वर्णन भागवत में विस्तार से है।
राजस्थान और प। बंगाल में सावन के कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाई जाने वाली नागपंचमी का जिक्र हम इससे पहले कर चुके हैं। आज भी नागपंचमी है, जो उत्तर भारत और अन्य प्रांतों में ज्यादा व्यापक रूप से मनाई जाती है। इस दिन लोग व्रत रखकर सर्पराज तक्षक की पूजा करते हैं। सांपों को दूध पिलाकर उनकी आराधना की जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में घरों के दरवाजों पर गोबर से सर्प की आकृति बनाकर उनका पूजन किया जाता है। साथ ही रात में चारपाइयों के नीचे किसी बर्तन में दूध रखा जाता है। माना जाता है कि सर्पराज रात में दूध पीने आते हैं और घर में खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। यह भी मान्यता है कि ऋग और यजुर्वेद की रचना आज के दिन ही शुरू हुई थी। गुरुवार को चंद षष्ठी व्रत है। कुंवारी लड़कियां और नवविवाहित युवतियां इस दिन उपवास रखती हैं। शुक्रवार को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती है। शनिवार को दुर्गाष्टमी व्रत है। आज मेला चिंतपूर्णी समाप्त हो जाएगा। हिमाचल के बिलासपुर में मेला नैना देवी का आयोजन होगा। तिप्रस्तु : रमेश चंद
यह मुख्य रूप से महिलाओं का त्योहार है। इस दिन कुछ स्त्रियां परिवार में सुख-शांति के लिए व्रत भी रखती हैं और चंद्रमा को अर्घ्य देने के बाद भोजन ग्रहण करती हैं, हालांकि व्रत रखना जरूरी नहीं होता। इसी तरह यह वाली तीज सिर्फ विवाहित स्त्रियाँ ही नहीं, बल्कि कुमारी कन्याएँ भी मना सकती हैं। नवविवाहित और सुहागिन स्त्रियां अपने मायके में इस त्योहार को मनाती हैं। उनको मायके वालों की तरफ से वस्त्र, मिष्ठान और द्रव्य आदि से नवाजा जाता है। जिन युवतियों की शादी तय हो जाती है, उन्हें उनके ससुरालियों की ओर से उपहार आदि भेंट किए जाते हैं।
हरियाली तीज मुख्यत: धरती पर छाई लहलहाती फसल की खुशी और अच्छी पैदावार की कामना से मनाई जाती है। इस मौके पर स्त्रियां हरे रंग के परिधान पहनती हैं। इस तीज पर मेहंदी का खास महत्व है। वे अपने हाथों पर मेहंदी रचाती हैं और हरी चूड़ियां डालती हैं। विवाहित और अविवाहित सभी युवतियां सहेलियों के साथ झूलों पर झूलती हुई सावन से संबंधित गीत गाती हैं। ये गीत सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक सभी तरह के प्रसंगों से सराबोर होते हैं।
अब शहरों में भी इस मौके पर तीज मेलों का आयोजन किया जाने लगा है। शहरी मेलों में तो झूले और खानपान की दुकानें ही मुख्य आकर्षण होती हैं। हरियाली तीज के एक दिन पहले महिलाएं सिंधारा त्योहार मनाती हैं। इसका नवविवाहिता स्त्रियों के लिए विशेष महत्व है। शादी के बाद पहले सिंधारा पर उन्हें अच्छे परिधान और गहने आदि भेंट किए जाते हैं।
वृंदावन स्थित बांके बिहारी मंदिर में इस दिन कृष्ण और राधा की स्तुति और आराधना की जाती है। वृंदावन में यह त्योहार जन्माष्टमी तक मनाया जाता है। माना जाता है कि बाल्यकाल में कृष्ण, राधा को झूला झुलाते थे और सभी गोपिकाएं उनका साथ देती थीं। कृष्ण भक्त उमंग और खुशी के साथ यह त्योहार मनाते हैं। साल में केवल हरियाली तीज के दिन कृष्ण को झुलाने के लिए सोने का झूला तैयार किया जाता है। मंदिर में पूजा के बाद श्रद्धालुओं पर जल छिड़का जाता है, जो यह दर्शाता है कि अब मॉनसून पूरे यौवन पर है। वैसे यह त्योहार दिल्ली, राजस्थान, यूपी और एमपी में खासतौर से मनाया जाता है।
राजस्थान में शिव और पार्वती की पूजा का रिवाज है। गुजरात और महाराष्ट्र में भी महिलाएं राजस्थान की रीति-रिवाज का ही अनुसरण करती हैं। गुजरात में इस मौके पर गरबा नृत्य करती हुई स्त्रियां पार्वती की स्तुति में गीत गाती हैं। शिव पुराण के अनुसार हरियाली तीज के दिन ही शंकर और पार्वती का मिलन हुआ था। हरियाली तीज पर वैसे तो कई जगह मेलों का आयोजन किया जाता है, लेकिन जयपुर (राजस्थान) का मेला विशेष रूप से उल्लेखनीय है।
मंगलवार को मुस्लिम महीना शाबान शुरू होगा। बुधवार को कल्कि जयंती है। श्रीमद्भागवत में वर्णन है कि त्रेता में राजा परीक्षित के शासन काल में ही कलियुग ने अपना स्थान जमा लिया था। कलियुग में आसुरी शक्तियों के विनाश के लिए विष्णु पुन: भगवान कल्कि के रूप में जन्म लेंगे। उनका वाहन घोड़ा होगा। कलियुग में कर्म के आधार पर ही मनुष्य को गति मिलेगी, ऐसा वर्णन भागवत में विस्तार से है।
राजस्थान और प। बंगाल में सावन के कृष्ण पक्ष की पंचमी को मनाई जाने वाली नागपंचमी का जिक्र हम इससे पहले कर चुके हैं। आज भी नागपंचमी है, जो उत्तर भारत और अन्य प्रांतों में ज्यादा व्यापक रूप से मनाई जाती है। इस दिन लोग व्रत रखकर सर्पराज तक्षक की पूजा करते हैं। सांपों को दूध पिलाकर उनकी आराधना की जाती हैं। ग्रामीण इलाकों में घरों के दरवाजों पर गोबर से सर्प की आकृति बनाकर उनका पूजन किया जाता है। साथ ही रात में चारपाइयों के नीचे किसी बर्तन में दूध रखा जाता है। माना जाता है कि सर्पराज रात में दूध पीने आते हैं और घर में खुशहाली का आशीर्वाद देते हैं। यह भी मान्यता है कि ऋग और यजुर्वेद की रचना आज के दिन ही शुरू हुई थी। गुरुवार को चंद षष्ठी व्रत है। कुंवारी लड़कियां और नवविवाहित युवतियां इस दिन उपवास रखती हैं। शुक्रवार को गोस्वामी तुलसीदास की जयंती है। शनिवार को दुर्गाष्टमी व्रत है। आज मेला चिंतपूर्णी समाप्त हो जाएगा। हिमाचल के बिलासपुर में मेला नैना देवी का आयोजन होगा। तिप्रस्तु : रमेश चंद
पति को बदल दूंगी
पहली महिलाः सुना है , तुम्हारे होने वाले पति बहुत गुस्से वाले हैं ?
दूसरीः ठीक सुना है तुमने , लेकिन मैं शादी के बाद उसे बदल दूंगी।
पहलीः एक बार शादी होने के बाद पति कैसे बदल लोगी ?
दूसरीः ठीक सुना है तुमने , लेकिन मैं शादी के बाद उसे बदल दूंगी।
पहलीः एक बार शादी होने के बाद पति कैसे बदल लोगी ?
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