rashtrya ujala

Saturday, November 20, 2010

मौत के पंजे में फंसे रहते हैं मजदूर

मौत बेशक अन्जान बनकर आती है,लेकिन मौत कभी भी अकेले नहींजाती। अपने पीछे वह कई जिन्दा लोगों को मौत की मानिंद जिंदगी दे जाती है जिसकी टीस मुद्दतों तक कायम रहती है। उस मौत का फलसफा भी अजीब होता है जब उसकी गिनती बेमौत कहलातीहै। सोमवार रात लक्ष्मीनगर इलाके में ऐसी ही बेमौत जिंदगी का मंजर दिखाई दिया, जिसने अपने पीछे सुहागिनों के सिंदूर से लेकर सैकड़ों बच्चों की मासूमियत भरी ंिजंदगी को गम के लावे में तब्दील कर दिया। हादसे के वक्त दिनभर काम करके थके मजदूर अगले सुबह की इंतजार कर रहे थे तभी एक ऐसा जलजला आया कि रात का शुरूआती पहर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन गया। मारे गए दर्जनों बदकिस्मत इंसान तबाह हो गई कई जिंदगियां....बदले में मिली तो सिर्फ और सिर्फ घडय़ाली आंसुओं का सहारा। वैसे तो दिल्ली कई बार उजड़ी और बसाई गई है, लेकिन साठ सालों में बनी नई दिल्ली में मौत के सौदागरों के चलते उन बेशकीमती जिंदगी हमेशा-हमेशा के लिए रूखसत हो गईं जिनके उपर जिम्मेदारियों का एक बड़ा पहाड़ था। आठ साल का नौशाद ईद का बेसब्री से इंतजार कर रहा था कि उसके वालिद उसके लिए नए कपड़ों और खिलौने लाएंगे। नौशाद की नन्ही आंखों में ईद की खुशियां शायद हमेशा-हमेशा के लिए दफन हो गई। राजकुमार भी उन्हीं लोगों में से एक था जो बिहार के एक गांव से अपनी विवाह योग्य पुत्री के लिए पैसा कमाने आया था, ताकि वह अपनी बेटी को ससुराल विदा कर सके।
इन अनगिनत सपनों का कातिल कौन है? मौत की इमारत बनाने वाला बिल्डर अमृतलाल सिंह या दिल्ली नगर निगम या फिर दोनों। कानून की नजरों में अमृतलाल पहले से ही कई मामलों में गुनहगार रहा है बावजूद इसके उसे नियमों को ताक पर रखकर मकान बनाने की इजाजत उसे किसने दी। क्या एमसीडी जनसुविधाएं मुहैया कराने के नाम पर मौत बांट रही है सवाल यह भी पैदा होता है। दिल्ली-एनसीआर में रहने वाले लाखों लोग अपना घर बार छोड़कर रोजी-रोजगार कमाने के लिए आते है। जबकि काफी तादाद में विद्यार्थी भी पढऩे आते है किस तरह की जिंदगी और किन हालातों में वह रह रहे हैं इस बात का इल्म क्या दिल्ली सरकार को है। इस बात की गारंटी कौन लेगा कि लक्ष्मीनगर जैसा हादसा दोबारा नहीं होगा। जबकि ठीक इसके उलट दिल्ली-एनसीआर की कई कालोनियां सरकार की नजरों में अवैध हैं बावजूद इसके धन की लालचों में उनकी उंचाई और संख्या दिनों-दिन बढ़ रही है। बगैर किसी भूकंप के लक्ष्मीनगर में इमारत का ढहना हैरत में डालता है, फर्ज करें अगर दिल्ली-एनसीआर में भूकंप आ जाए ज्यादातर इमारतों को ताश के पत्तों की तरह बिखरने में देर नहीं लगेगा। तब चारों तरफ मौत के बीच जिंदगियां तलाशी जाएगी। क्या सरकार और प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रही है जो कभी भी दिल्ली-एनसीआर पर कहर बनकर टूटेगा। नोएडा, गुडग़ांव, फरीदाबाद, गाजियाबाद में कंक्रीट के जंगलो का तेजी से विस्तार हो रहा है,लेकिन उनकी बुनियाद कितनी मजबूत है इसकी फिक्र है सरकार को। राजस्व कमाने के चलते आज हर दफ्तरों में नियम-कानून की बखिया उधेड़ी जा रही है और सरकार धृतराष्ट्र की तरह महाविनाश का इंतजार कर रही है। जिला प्राधिकरण आज की तारीख में भू-माफियाओं की गोद में खेल रहा है,जिसे पैसे की अफीम खिलाकर मौत के सौदागर अपना व्यापार बढ़ा रहे है। अब वक्त आ गया है कि दिल्ली-उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकार और अफसर अपनी निद्रा तोड़े और अमृतलाल जैसे गुनाहगारों को अमृत के बदले जहर का घोल पिलाए।

No comments: