rashtrya ujala

Wednesday, September 10, 2008

महिलाओं के लिए साहस का एक आदर्श उदाहरण

35 वर्षीय कोमा मोहन्ती एक पूर्ण-विकसित एड्स रोगी बनने की ओर अग्रसर है। उसकी इस दुर्भाग्यपूर्ण अवस्था में उसका एकमात्र सहारा है, उसकी धंसी हुई आंखें और उसकी कष्टासाध्य, निस्तेज चाल। वास्तव में, वह ओड़िसा के गंजम जिले की उन महिलाओं के लिए साहस का एक आदर्श उदाहरण है जो ऐसी कष्टकर अवस्था में जी रही हैं।काम के बेहतर अवसरों की तलाश में कोमा के पति त्रिनाथ ने जब गंजम जिले के पुरूषोत्तमपुर विकासखण्ड में बसे अपने गांव से गुजरात की ओर पलायन किया, तब कोमा के जीवन में पहले तो खुशहाली आई, लेकिन फिर सारी आशाएं चूर-चूर हुई और उसका जीवन बर्बाद हो गया। उसके द्वारा भेजी जाने वाली अपर्याप्त ही सही पर नियमित राशि के चलते उनके तीन बच्चों का स्कूल जाना तो खैर निश्चित हुआ। इसके बाद, साल-दो साल में इक्का-दुक्का अवसरों पर जब-जब वह घर आया अपने परिवार के लिए संदूक भर कपडे-लत्ते, खेल-खिलौने लाया। ऐसी ही किसी एक गृह-यात्रा में कपड़े-लत्तों, खेल-खिलौनों के साथ-साथ एक बिन बताया एचआईवी (ह्युमन इम्युनोडेफिसिएन्शी) वायरस भी उसके साथ चला आया। 2006 में हुए एक परीक्षण में उसके एचआईवी पॉजिटिव होने का प्रमाण भी मिला। बाद में, उसी साल उस खतरनाक बीमारी ने उसके प्राण भी लील लिए।कहीं ये 'संक्रमण' उनकी जान को न लग जाए, इस डर से उसके गांव का कोई भी व्यक्ति उसके दाह-संस्कार में नहीं आया। ऐसे समय, 'निर्माता' नामक एक स्थानीय एनजीओ ने इस काम में कोमा की मदद की, लेकिन पति के इस दुर्भाग्यपूर्ण अन्त से ही प्रारंभ हुआ सामाजिक स्वीकार्य पाने हेतु कोमा का दीर्घ व असम्भव-सा संघर्ष। ओड़िसा की एड्स कण्ट्रोल सोसाइटी (ओएसएसीएस) के अनुसार दिसम्बर 2007 तक प्रदेश भर में एड्स के कारण हुई मौतों में से 35 प्रतिशत मौतें गंजम जिले में हुए तथा कुल 8,200 एचआईवी-पॉजिटिव रोगियों में से 37।8 प्रतिशत रोगी अकेली गंजम जिले में थे।कोमा जैसी एचआईवीएड्स (डब्ल्यूएलएचए) पीड़ित महिलाएं हिम्मत बटोर न केवल इस भयावह रोग का सामना दिलेरी से कर रही हैं, बल्कि अपने साथ होने वाले भेदभाव से भी दो-चार हो रही हैं। अपने समर्थन-समूहों के बीच जानकारी व चेतना बांटकर वे अपना खोया सम्मान भी वापस पा रही हैं। पति की मृत्यु के बाद, नवम्बर 2006 में कोमा एचआईवी-संक्रमित पाई गई। कुछ दिनों बाद ही, 14 वर्ष का उसका सबसे बड़ा बेटा संतोष, गांव वालों द्वारा इस संदेह में सताए जाने पर कि उसे भी एचआईवी है, निकट के आम के बाग में मृत अवस्था में एक पेड़ से लटका पाया गया था। उसकी 13 वर्षीय बेटी गिरिजानंदिनी और उसका 12 वर्षीय बेटा निरंजन भी स्कूल में अपने साथियों द्वारा बहिष्कृत हुए, और अन्तत: उन्हें शालात्याग करना पड़ा। कोमा के कष्ट यहीं खत्म न हुए। बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम व एलर्जी भरे फोडे-फ़ुंसियों से परेशान हो जब-जब वह इलाज के लिए भटकुमरादा जन स्वास्थ्य केन्द्र (पीएचसी) जाती, वहां के स्वास्थ्य कर्मी उसे घण्टों प्रतीक्षा में खड़ा रखते क्योंकि वे अचआईवी संक्रमित रोगियों को किसी न किसी बहाने टालना चाहते। शरीर व मन, दोनों से थकी-हारी कोमा अपना व अपने दोनों शेष बच्चों का जीवन समाप्त करने का सोचती, लेकिन निर्माता के कार्यकर्ता सर्बेश्वर महापात्र तथा कोमा के पड़ोसी व स्कूल के प्रधानाचार्य कृष्णचन्द्र दास की लगातार समझाइश के चलते कोमा ने ऐसा दु:साहस नही किया। दास साहब ने तो सारे अभिभावकों की स्कूल में एक विशेष मीटिंग बुलाई और कोमा को उस अवसर पर उद्धाटन दीप प्रावलित करने को कहा ताकि समुदाय में व्यापक स्तर पर उसके व उसके बच्चों के प्रति एक स्वीकार्य भाव उत्पन्न हो। अध्यापकों व अभिभावकों ने दास बाबू के इस कदम का विरोध भी किया पर वे टस से मस न हुए। सरकार ने फरवरी 2008 में मधुबाबू पेंशन योजना के तहत 200 रूपए मासिक की एक सहायता घोषित की।सरकार की इस पहल से एड्स के कारण बनी विधवाओं को आर्थिक व मानसिक सबल मिलने की आशा है। धीमे ही सही, पर एक निश्चित परिवर्तन की आहट सुनाई तो देती है। (नाम-परिवर्तन नहीं किया गया है, रिपोर्ट में उल्लिखित मअन्तत: दास बाबू की यह कोशिश फल लाई। दो महीने के भीतर, कोमा के दोनों बच्चों की स्कूल-वापसी हुई और इस वर्ष की अन्तिम परीक्षा में तो कमाल ही हो गया, कोमा के पुत्र ने कुल मिलाकर 65 प्रतिशत अंक पाये, जबकि उसकी बहन 60 प्रतिशत अंकों से उत्तीर्ण हुई। आज चाहे कोमा का स्वास्थ्य ढलान पर हो, पर उसका मन काफी दृढ़ है। ठीक महसूस करने पर वह पड़ोस के गांवों और स्कूलों में एचआईवीएड्स संबंधी जागरूकता रैलियों का नेतृत्व करती है और स्व-सहायता समूहों की बैठकों को संबोधित करती है।गंजम में महिलाएं अब एचआईवी एड्स पर खुल कर बात करती हैं, जिसमें झिझक या शर्म कहीं नहीं होती। इन विधवाओं के कष्टों को देखते हुए ओड़िसाहिलाओं ने स्वैच्छिक एवं सार्वजनिक ढंग से अपना एचआईवी पीड़ित होना घोषित किया है।)

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